
बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने वैवाहिक विवादों में भरण-पोषण (Maintenance) को लेकर एक ऐतिहासिक और नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है, अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि पत्नी आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर है और सम्मानजनक जीवन जीने के लिए पर्याप्त आय अर्जित कर रही है, तो वह पति से अंतरिम गुजारा भत्ता नहीं मांग सकती।
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क्या था पूरा मामला?
यह मामला एक ऐसे दंपति से जुड़ा था जहां पत्नी एक चिकित्सा अधिकारी (Medical Officer) के रूप में कार्यरत है और उसका मासिक वेतन लगभग 1.38 लाख रुपये है, पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत निचली अदालत में याचिका दायर कर पति से गुजारा भत्ते की मांग की थी, निचली अदालत ने पति को ₹15,000 प्रति माह देने का आदेश दिया था, जिसे पति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
- जस्टिस अभय एस. वाघवासे की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि पत्नी ‘क्लास-1’ अधिकारी है और उसकी आय उसे एक स्वतंत्र और आरामदायक जीवन जीने की अनुमति देती है।
- अदालत ने अपने फैसले में कहा कि भरण-पोषण का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी पक्ष अभाव में न रहे। लेकिन जब पत्नी ₹1.38 लाख कमा रही हो, तो वह “पूरी गरिमा और सम्मान” के साथ अपना जीवन यापन कर सकती है। ऐसे में पति पर वित्तीय बोझ डालना कानून की मंशा के विपरीत है।
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 का लाभ केवल उन जीवनसाथियों के लिए है जिनके पास अपनी जीविका चलाने का कोई स्वतंत्र जरिया नहीं है।
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बच्चे के लिए राहत बरकरार
हालांकि, हाईकोर्ट ने पत्नी के लिए भरण-पोषण के आदेश को रद्द कर दिया, लेकिन यह स्पष्ट किया कि नाबालिग बच्चे के प्रति पिता की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती, कोर्ट ने बच्चे के लिए ₹10,000 के मासिक भरण-पोषण के आदेश को बरकरार रखा।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन मामलों में एक मिसाल बनेगा जहां उच्च शिक्षित और कामकाजी महिलाएं अच्छी आय होने के बावजूद गुजारा भत्ते की मांग करती हैं, कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ‘गरिमा’ से जीने की क्षमता रखने वाले आत्मनिर्भर व्यक्ति को भरण-पोषण का दावा करने का वैधानिक अधिकार नहीं है।
कानूनी दस्तावेजों और विस्तृत जानकारी के लिए आप बॉम्बे हाईकोर्ट की वेबसाइट पर जा सकते हैं।
















