असम सरकार ने जमीन खरीद-बिक्री के नियमों में क्रांति ला दी है। अब अलग धर्म के लोग अगर जमीन ट्रांसफर करेंगे, तो जिला मजिस्ट्रेट की मंजूरी बिना काम नहीं चलेगा। यह कदम राज्य की बदलती जनसंख्या को रोकने के लिए उठाया गया। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा इसे स्वदेशी संस्कृति की रक्षा का हथियार बता रहे हैं। पिछले सालों में कई जिलों में हिंदू आबादी घटी, जिसकी चिंता बढ़ गई। क्या यह नियम बिहार, बंगाल जैसे राज्यों तक फैलेगा?

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डेमोग्राफी का खतरा
असम बांग्लादेश से सटी लंबी सीमा वाला राज्य है। दशकों से अवैध बसावट की बातें होती रहीं। धुबरी, बारपेटा, नगांव जैसे इलाकों में स्थानीय हिंदू परिवारों की जमीनें दूसरे समुदाय में चली गईं। आरोप है कि कई बार डराया-धमकाया या सस्ते दामों पर डील हुई। CM सरमा कहते हैं, ऐसी स्थिति में असमिया अपनी धरती पर ही बाहरी हो जाएंगे। नया कानून जांच सुनिश्चित करेगा कि डील स्वेच्छा से हो।
नए नियम की पूरी डिटेल
अब हिंदू से मुस्लिम या मुस्लिम से हिंदू को जमीन बेचने के लिए DC को आवेदन देना पड़ेगा। DC चेक करेंगे कि कोई दबाव तो नहीं, और इलाके का संतुलन बिगड़ेगा या नहीं। एक ही धर्म के बीच कोई पाबंदी नहीं। फोकस बॉर्डर और मुस्लिम बहुल जिलों पर। यह सिर्फ प्रशासनिक कदम है, लेकिन असर गहरा।
नॉर्थ-ईस्ट में चेन रिएक्शन
यह फैसला पूरे पूर्वोत्तर को हिला देगा। मेघालय, अरुणाचल में पहले से जमीन सुरक्षा के सख्त कानून हैं। त्रिपुरा, मणिपुर में अब मांग उठ रही। VHP ने देशव्यापी लागू करने की बात कही। झारखंड, पश्चिम बंगाल के चुनावी मुद्दे याद हैं, जहां जमीन विवाद गरमाए। असम का मॉडल वहां ट्रायल हो सकता है।
विपक्ष की चीखें बनाम समर्थकों का तर्क
कांग्रेस और कुछ क्षेत्रीय दल इसे भेदभावपूर्ण बता रहे। कहते हैं, संपत्ति बेचना संवैधानिक हक है। सरकार जवाब देती है, यह असमिया पहचान बचाने की जरूरत। NRC अपडेट और घुसपैठ रोक के बीच यह स्टेप मजबूत पकड़ देगा। पुरानी संदिग्ध डील्स पर भी नजर पड़ सकती है।
असम के इस कदम से आने वाली पीढ़ियां अपनी विरासत बचा पाएंगी या नहीं, समय बताएगा। बाकी राज्य क्या करेंगे? आपकी राय कमेंट में शेयर करें।
















