
वैवाहिक विवादों और तलाक के बढ़ते मामलों के बीच उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को स्पष्ट किया है, कोर्ट ने अपने हालिया फैसले में कहा है कि यदि कोई पति अपनी पत्नी की पिछली गलतियों या क्रूरता को माफ कर देता है और उसके साथ दोबारा वैवाहिक संबंध (सहवास) शुरू कर देता है, तो वह बाद में उन्हीं पुरानी घटनाओं के आधार पर तलाक का दावा नहीं कर सकता।
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‘माफी’ बनी तलाक में बाधा
अदालत ने ‘कंडोनेशन ऑफ क्रुएल्टी’ (क्रूरता की माफी) के सिद्धांत पर जोर देते हुए स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 23(1)(b) के तहत, यदि पीड़ित पक्ष ने अपने जीवनसाथी की गलती को जानकर भी उसे स्वीकार कर लिया है और साथ रहने का फैसला किया है, तो यह माना जाएगा कि उसने उस अपराध को कानूनी रूप से माफ कर दिया है, ऐसी स्थिति में पुराने आधारों पर तलाक की डिक्री जारी नहीं की जा सकती।
कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा, “वैवाहिक जीवन में सुलह और दोबारा साथ रहना इस बात का प्रमाण है कि पक्षों ने पिछली कड़वाहट को भुला दिया है, एक बार जब माफी दे दी गई और सामान्य वैवाहिक जीवन बहाल हो गया, तो उन्हीं पुरानी शिकायतों को फिर से जीवित कर तलाक की मांग करना कानूनन सही नहीं है।”
कब मिल सकता है तलाक?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि तलाक के रास्ते पूरी तरह बंद हो गए हैं, यदि दोबारा साथ रहने (सुलह) के बाद पत्नी फिर से कोई नई गंभीर गलती या क्रूरता करती है, तो पति नए सिरे से कानूनी आधार तैयार कर तलाक की अर्जी दे सकता है।
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वैवाहिक विवादों पर असर
यह फैसला उन पतियों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो सुलह के बाद भी पुराने विवादों को अदालत में घसीटना चाहते हैं, कानून अब स्पष्ट है: या तो आप पूरी तरह माफ कर साथ रहें, या फिर कानूनी प्रक्रिया का पालन करें, एक बार सुलह होने के बाद ‘पुरानी फाइलें’ खोलना अब आसान नहीं होगा।
















