
भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में अक्सर लोग कलेक्टर (DM) और कमिश्नर के पदों को लेकर कन्फ्यूज रहते हैं। क्या DM जिले का सर्वोच्च बॉस होता है या कमिश्नर का दायरा उससे बड़ा है? कौन ज्यादा पावरफुल है – जमीनी स्तर का फैसला लेने वाला कलेक्टर या कई जिलों पर नजर रखने वाला संभागीय आयुक्त? आज हम इस टॉपिक पर विस्तार से बात करेंगे, ताकि आपकी दुविधा दूर हो सके।
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ब्रिटिश काल से चली आ रही ये व्यवस्था
भारतीय प्रशासन की जड़ें ब्रिटिश राज में हैं। कलेक्टर को मूल रूप से ‘कलेक्टर ऑफ रेवेन्यू’ कहा जाता था, जो जमींदारी और टैक्स वसूली का काम देखता था। आजादी के बाद ये पद DM (District Magistrate) या जिलाधिकारी के रूप में विकसित हुआ। वहीं, कमिश्नर संभागीय स्तर पर समन्वय का काम करता है। दोनों IAS अधिकारी होते हैं, लेकिन इनके कार्यक्षेत्र और अधिकार अलग-अलग हैं।
कलेक्टर कौन?
कलेक्टर एक जिले का चेहरा होता है। IAS कैडर से आता है और जिले में सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी माना जाता है। मुख्य जिम्मेदारियां:
- कानून-व्यवस्था बनाए रखना (मजिस्ट्रेट के तौर पर गिरफ्तारी, धारा 144 लागू करना)।
- राजस्व संग्रह, भूमि विवाद सुलझाना।
- चुनाव प्रक्रिया, आपदा प्रबंधन (बाढ़, सूखा, महामारी)।
- सभी विभागों (पुलिस, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि) का समन्वय।
उदाहरण: बिहार या यूपी के किसी जिले में बाढ़ आने पर DM राहत शिविर लगाता, राशन बांटता और केंद्र सरकार को रिपोर्ट भेजता। जिले में उसकी ‘चलती है सबसे ज्यादा’, क्योंकि फैसले सीधे उसके हाथ में होते हैं।
कमिश्नर की भूमिका
कमिश्नर (Divisional Commissioner) कई जिलों (4-6) वाले संभाग का प्रमुख होता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में ये पद मौजूद हैं। मुख्य काम:
- DMs की निगरानी और मार्गदर्शन।
- संभागीय राजस्व, नहर सिंचाई, कानून व्यवस्था का समग्र प्रबंधन।
- राज्य सरकार को रिपोर्टिंग और नीतिगत सलाह।
कमिश्नर का दायरा व्यापक होता है, लेकिन वो सीधे जमीनी काम नहीं करता। वो DMs के काम की समीक्षा करता, विवाद सुलझाता। जैसे, यूपी के लखनऊ संभाग में कमिश्नर लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली के DMs को गाइड करता।
तुलना तालिका
| विशेषता | DM (कलेक्टर) | कमिश्नर |
|---|---|---|
| क्षेत्र | 1 जिला | 1 संभाग (4-6 जिले) |
| पावर प्रकार | सीधी (कार्यकारी, मजिस्ट्रेटी) | अप्रत्यक्ष (पर्यवेक्षण, नीतिगत) |
| दैनिक प्रभाव | जिले में ‘सबसे ज्यादा चलती है’ | संभाग में समन्वयकारी |
| सैलरी/सुविधा | समान (IAS लेवल), बंगला-गाड़ी | थोड़ी ऊंची सीनियरिटी से |
| उदाहरण | बाढ़ राहत का सीधा फैसला | DMs के प्रदर्शन की रिपोर्ट |
DM की जमीनी पावर ज्यादा लगती है, लेकिन पदानुक्रम में कमिश्नर सीनियर होता है (लगभग 15-20 साल का IAS अनुभव)। निष्कर्ष: DM की ‘रनिंग पावर’ ज्यादा, कमिश्नर की ‘ओवरसीइंग पावर’।
क्यों मायने रखता है ये अंतर?
UPSC एस्पिरेंट्स, पत्रकारों या आम नागरिकों के लिए ये जानना जरूरी। जैसे, दिल्ली में कोई शिकायत DM को, लेकिन संभागीय मुद्दे कमिश्नर को। सभी राज्य में ये पद नहीं – झारखंड, केरल में कमिश्नर सिस्टम कम है। अगर आप यूपी/बिहार से हैं, तो लोकल DM आपकी जिंदगी बदल सकता, लेकिन कमिश्नर संभाग को दिशा देता। सलाह: सरकारी साइट्स चेक करें या RTI दाखिल कर लोकल स्ट्रक्चर जानें। प्रशासन
















