
कल 1 फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण संसद में बजट पेश करने वाली हैं, और सबकी नजरें पेट्रोल-डीजल पर टिकी हैं। सालों से ये बात हो रही है कि इन्हें जीएसटी के दायरे में ला दिया जाए। अभी तो हर शहर में कीमतें अलग-अलग हैं – दिल्ली में पेट्रोल 95 के आसपास, मुंबई में 105 पार। डीजल की तो बात ही छोड़ो, 88 से 96 तक घूम रही है।
अगर जीएसटी आ गया, तो पूरे देश में एक ही दाम? सोचो जरा, कितनी राहत मिलेगी! ये सिर्फ फ्यूल की बात नहीं, ट्रांसपोर्ट के खर्चे कम होंगे, सब्जी से लेकर सामान तक सस्ता पड़ सकता है।
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पेट्रोल-डीजल की कीमत में क्या-क्या मिला हुआ है?
देखो, पेट्रोल पंप पर जो 100 रुपये देते हो, वो सिर्फ तेल नहीं खरीद रहे। चार चीजें मिली हुई हैं इसमें। पहला, बेसिक कीमत – यानी क्रूड ऑयल की लागत, रिफाइनिंग और ढुलाई का पूरा खर्चा। फिर आता है डीलर का कमीशन, जो पंप वाले भाई को मिलता है। तीसरा, केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी, जो भारी-भरकम होती है। और सबसे बड़ा खेल राज्य सरकारों का वैट! हर राज्य अपना-अपना रेट लगाता है – कोई 20%, कोई 30%। यही वजह है कि एक ही देश में कीमतें इतनी बिखरी हुई हैं। जीएसटी आया तो ये वैट-एक्साइज का जंगल खत्म!
जीएसटी आने से कीमतें कैसे सस्ती होंगी?
जीएसटी का जादू तो यही है ना – एक टैक्स, सब कुछ कवर। 2017 में जब जीएसटी लगा, पेट्रोल-डीजल को बाहर रखा गया था, क्योंकि राज्यों को डर था रेवेन्यू कम हो जाएगा। लेकिन अब समय आ गया लगता है। एक्सपर्ट्स कहते हैं, जीएसटी लगने पर वैट और एक्साइज ड्यूटी मर्ज हो जाएंगे। मान लो 18% या 28% का स्लैब लगा (जो तय होगा), तो ओवरऑल टैक्स बर्डन कम हो सकता है। नतीजा? रिटेल प्राइस में 5-10 रुपये की कटौती आसानी से! और हां, पूरे देश में यूनिफॉर्म रेट्स – गुजरात से केरल तक एक ही दाम। लॉजिस्टिक्स कॉस्ट गिरेगी, ट्रक वाले खुश, दुकानदार खुश, हमारी जेब खुश।
आम आदमी को क्या फायदा, कौन सी उम्मीदें?
सोचो, रोज कार-बाइक चलाते हो, टैक्सी लेते हो, सब महंगा लगता है ना? जीएसटी से फ्यूल सस्ता हुआ तो ऑटो रिक्शा से लेकर ओला-उबर तक किराया कम। ग्रॉसरी, कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स – सबकी कीमतों पर असर पड़ेगा क्योंकि ट्रांसपोर्ट चिप्स। मिडिल क्लास के लिए ये बड़ी राहत होगी, जो पहले से ही महंगाई से जूझ रहा है। लेकिन हां, राज्यों की सहमति जरूरी। कुछ राज्य कहते हैं, ‘हमारा टैक्स कम्पनसेशन कहां से आएगा?’ बजट में शायद केंद्र इससे डील करे। कुल मिलाकर, अगर ऐलान हुआ तो स्टॉक मार्केट से लेकर स्ट्रीट तक खुशी की लहर दौड़ेगी।
चुनौतियां क्या हैं, कब होगा ऐलान?
बात आसान लग रही है, लेकिन हकीकत में राज्यों का रेवेन्यू इश्यू बड़ा है। केंद्र को कंपनसेट करना पड़ेगा। फिर स्लैब कौन सा? 5% बहुत कम, 40% बहुत ज्यादा। बीच में 18-28% संभव। ऑयल मार्केटिंग कंपनियां भी तैयार हैं, लेकिन ग्लोबल क्रूड प्राइस पर भी निर्भर। वैसे, बजट 2026 में ये होने की पूरी संभावना है – क्योंकि आम चुनावों का दबाव, महंगाई कंट्रोल। कल इंतजार करो, निर्मला जी क्या कमाल दिखाती हैं!
















