
सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल हाईवे एक्ट (NH Act), 1956 के तहत अधिग्रहित की जाने वाली जमीनों के मुआवजे को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है, कोर्ट ने माना कि वर्तमान व्यवस्था में गंभीर “संरचनात्मक कमियां” (Structural Deficiencies) हैं, जिसके कारण किसानों और जमीन मालिकों को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ रहा है।
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मुआवजे में विसंगति पर सवाल
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने सुनवाई के दौरान रेखांकित किया कि NH Act, 1956 के तहत जिन लोगों की जमीनें ली जा रही हैं, उन्हें मिलने वाला मुआवजा अन्य कानूनों (जैसे ‘उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013’) के तहत मिलने वाले मुआवजे की तुलना में काफी कम है, कोर्ट ने इसे जमीन मालिकों के साथ एक प्रकार का भेदभाव करार दिया।
कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
- कोर्ट ने कहा कि एक ही उद्देश्य (सार्वजनिक कार्य) के लिए जमीन लेने के बावजूद अलग-अलग कानूनों के कारण मुआवजे की राशि में जमीन-आसमान का अंतर नहीं होना चाहिए।
- पीठ ने कहा कि 1956 का अधिनियम उन लोगों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान नहीं करता जिनकी आजीविका पूरी तरह जमीन पर निर्भर है।
- सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इस मामले की गहराई से जांच करने और यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि मुआवजे की गणना की प्रक्रिया निष्पक्ष और तर्कसंगत हो।
क्या है मुख्य विवाद?
दरअसल, नेशनल हाईवे एक्ट के तहत मुआवजे के निर्धारण के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया अक्सर बाजार दरों और सोलेशियम (सांत्वना राशि) के मामले में अन्य आधुनिक कानूनों से पिछड़ जाती है, इसके कारण प्रभावित पक्ष अक्सर अदालतों का दरवाजा खटखटाते हैं, जिससे हाईवे परियोजनाओं में भी देरी होती है।
सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि विकास की प्रक्रिया में नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों, विशेषकर अनुच्छेद 300A (संपत्ति का अधिकार), का उल्लंघन नहीं होना चाहिए, केंद्र सरकार को अब इस विसंगति को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे ताकि भविष्य में मुआवजे के दावों में एकरूपता बनी रहे।
















