
यदि आप या आपके परिचित किसी के साथ लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationship) में रहने की योजना बना रहे हैं, तो यह खबर आपके लिए बेहद जरूरी है, अब लिव-इन में रहना सिर्फ आपसी सहमति का मामला नहीं रह गया है, बल्कि सरकार ने इसके लिए बेहद सख्त कायदे-कानून लागू कर दिए हैं, थोड़ी सी भी लापरवाही आपको कानूनी मुश्किलों में डाल सकती है और आपको कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने पड़ सकते हैं।
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अनिवार्य हुआ रजिस्ट्रेशन: अब छिपकर रहना होगा मुश्किल
नए नियमों (UCC Uttarakhand 2024) के तहत अब लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण (Registration) अनिवार्य कर दिया गया है। यदि कोई जोड़ा एक महीने से अधिक समय तक बिना रजिस्ट्रेशन के साथ रहता है, तो उसे अवैध माना जाएगा। रिश्ता शुरू होने के 30 दिनों के भीतर इसकी जानकारी रजिस्ट्रार को देनी होगी।
रजिस्ट्रेशन न कराने पर जेल और भारी जुर्माना
सरकार ने इन नियमों को लेकर सख्त रुख अपनाया है। यदि कोई जोड़ा लिव-इन का पंजीकरण नहीं कराता है, तो उन्हें 3 महीने तक की जेल या 10,000 रुपये का जुर्माना भुगतना पड़ सकता है, इतना ही नहीं, यदि पंजीकरण के दौरान गलत जानकारी दी गई, तो सजा और भी सख्त हो सकती है।
माता-पिता को दी जाएगी सूचना
नए नियमों के अनुसार, यदि लिव-इन में रहने वाले किसी भी पार्टनर की उम्र 21 वर्ष से कम है, तो रजिस्ट्रार इसकी आधिकारिक सूचना उनके माता-पिता या अभिभावकों को देगा, इसके पीछे सरकार का तर्क युवाओं की सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित करना है।
बच्चों को मिलेंगे पूरे अधिकार
नए कानून में लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा होने वाले बच्चों के भविष्य को सुरक्षित किया गया है, ऐसे बच्चों को वैध (Legitimate) माना जाएगा और उन्हें अपने माता-पिता की संपत्ति में कानूनी रूप से पूरा हक मिलेगा।
महिलाओं को मिलेगा भरण-पोषण (Maintenance)
लिव-इन में रहने वाली महिलाओं के अधिकारों को मजबूती देते हुए यह प्रावधान किया गया है कि यदि पुरुष पार्टनर महिला को छोड़ देता है, तो महिला अदालत के जरिए भरण-पोषण (Maintenance) की मांग कर सकती है।
रिश्ता खत्म करने की भी है कानूनी प्रक्रिया
सिर्फ साथ रहने के लिए ही नहीं, बल्कि अलग होने के लिए भी नियम बनाए गए हैं, यदि कोई जोड़ा अलग होना चाहता है, तो उन्हें ‘टर्मिनेशन स्टेटमेंट’ जमा करना होगा, मनमर्जी से रिश्ता तोड़कर भागना अब कानूनी पेचीदगियां पैदा कर सकता है।
भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कानूनी स्थिति विकसित हो रही है, जबकि उत्तराखंड जैसे कुछ राज्यों ने इसे लेकर विशिष्ट प्रावधान किए हैं, देश के अन्य हिस्सों में भी इस पर बहस जारी है। किसी भी कानूनी कार्रवाई से बचने और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए, यह महत्वपूर्ण है कि आप राष्ट्रीय महिला आयोग (National Commission for Women) जैसे संस्थानों द्वारा जारी दिशा-निर्देशों और अपने क्षेत्र के स्थानीय कानूनों से अवगत रहें।
















