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भाई सरकारी नौकरी में है और अलग रहता है, तो भी बहन को मिलेगी अनुकंपा नियुक्ति; MP हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला! जानें पूरा मामला।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का दिल जीतने वाला फैसला! देवास बैंक नोट प्रेस की बर्खास्त अनाथ बेटी मनीषा बहाल। कोर्ट बोला- अलग रहने वाले भाई की नौकरी अनुकंपा भर्ती में बाधा नहीं। बिना जांच निकालना गलत। पूरा वेतन और लाभ मिलेंगे। ये फैसला हजारों परिवारों को राहत देगा।

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भाई सरकारी नौकरी में है और अलग रहता है, तो भी बहन को मिलेगी अनुकंपा नियुक्ति; MP हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला! जानें पूरा मामला।

इंदौर की हाईकोर्ट खंडपीठ ने एक ऐसा फैसला सुनाया है, जो अनाथ बेटियों और जरूरतमंद परिवारों के लिए उम्मीद की किरण बन गया है। सोचिए, पिता का सहारा छिन जाए, मां भी न रहें, और फिर नौकरी मिलने के चंद महीनों बाद विभाग उल्टा सवाल ठोंक दे – ‘भाई तो पहले से नौकरी में है न?’ लेकिन कोर्ट ने साफ कहा, अगर भाई अपना अलग परिवार चला रहा है, तो बहन का हक छीनना गलत है। देवास बैंक नोट प्रेस की एक महिला कर्मचारी को बर्खास्त करने का आदेश रद्द कर कोर्ट ने उसे वापस नौकरी पर बहाल करने का हुक्म दिया। ये फैसला न सिर्फ कानूनी जीत है, बल्कि इंसानियत की मिसाल भी।

पूरा मामला क्या था?

देवास की मनीषा, जो अनुसूचित जनजाति से ताल्लुक रखती हैं, ने अपनी जिंदगी की सबसे कठिन जंग लड़ी। उनके पिता बैंक नोट प्रेस में सीनियर चेकर थे, लेकिन ड्यूटी के दौरान उनका निधन हो गया। उसके बाद मां का भी साथ छूट गया। पूरी तरह बेसहारा हो चुकी मनीषा ने हिम्मत नहीं हारी। उनकी पढ़ाई-लिखाई ठीक थी, विभाग ने जांच भी की, और जनवरी 2025 में उन्हें जूनियर ऑफिस असिस्टेंट की पोस्ट पर अनुकंपा भर्ती दे दी। खुशी के आंसू बह रहे होंगे उस वक्त, लेकिन ये कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

विभाग ने क्यों ठोंका ब्रेक?

मनीषा की नौकरी को महज चार महीने हुए थे कि मई 2025 में विभाग ने नोटिस भेज दिया। आरोप लगाया गया कि उन्होंने ये बात छुपाई कि उनका बड़ा भाई 2013 से पुलिस में नौकरी कर रहा है। मनीषा ने सफाई दी – भाई तो अपना घर-परिवार अलग चला रहा है। न पापा पर निर्भर था, न अब मेरी जिम्मेदारी उठा रहा। लेकिन विभाग ने उनकी बात अनसुनी कर दी और सीधे नौकरी से निकाल दिया। सोचिए उस दर्द को, जब बेटी ने पिता की याद में नौकरी पकड़ी, और वो भी छिन गई।

कोर्ट की सख्त और इंसानी टिप्पणी

हाईकोर्ट ने मनीषा की याचिका पर सुनवाई की और विभाग की करतूतों पर सवाल उठाए। जजों ने कहा, बर्खास्तगी से पहले कोई ठीकम-तरीके से जांच क्यों नहीं हुई? भाई अलग रहता है, अपना परिवार है, तो अनुकंपा भर्ती में वो बाधा कैसे बन सकता है? विभाग ने मनीषा की बहन के बारे में भी कोई पुख्ता सबूत नहीं दिए। कोर्ट ने इसे साफ माना कि ये नियम परिवार की असल हालत को देखे बिना लागू नहीं हो सकते। ये फैसला हजारों परिवारों को राहत देगा, जहां भाई-बहन अलग-अलग जिंदगी जीते हैं।

बहाली का आदेश, अब इंसाफ मिला

अंत में कोर्ट ने बर्खास्तगी का पूरा आदेश रद्द कर दिया। मनीषा को फौरन जूनियर ऑफिस असिस्टेंट के पद पर वापस बहाल करने का निर्देश है। इतना ही नहीं, बर्खास्तगी की तारीख से लेकर अब तक का पूरा वेतन, सर्विस में निरंतरता और हर तरह के लाभ मिलेंगे। ये जीत सिर्फ मनीषा की नहीं, बल्कि उन तमाम बेटियों-बेटों की है जो माता-पिता के जाने के बाद अनुकंपा भर्ती पर निर्भर हैं। विभागों को अब सोचना पड़ेगा, नियम इंसानियत के खिलाफ नहीं चल सकते।

ये फैसला मध्य प्रदेश में अनुकंपा भर्ती की नीति को नया मोड़ देगा। कई परिवारों में भाई-बहन अलग घर बसाते हैं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि दूसरा सदस्य का हक मर जाए। मनीषा की कहानी हमें सिखाती है कि हिम्मत और न्याय पर भरोसा रखो, तो राह निकल आती है। अगर आपका भी ऐसा कोई केस है, तो ये फैसला हौसला बढ़ाएगा।

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info@dietjjr.in

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