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नगर निगम बड़ा या नगर पालिका? आपके शहर का बजट और पावर किसके हाथ में है? 5 मिनट में समझें प्रशासनिक शक्तियों का अंतर।

महाराष्ट्र निकाय चुनावों में BJP का दबदबा! मुंबई BMC में पहली बार मेयर बनाने को तैयार। नगर निगम vs नगर पालिका का फर्क जानिए – बड़े शहरों का बॉस निगम, छोटे कस्बों की नगर पालिका। मेयर, आयुक्त और पार्षद मिलकर शहर चमकाते। लोकल चुनाव क्यों हैं गेम-चेंजर?

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नगर निगम बड़ा या नगर पालिका? आपके शहर का बजट और पावर किसके हाथ में है? 5 मिनट में समझें प्रशासनिक शक्तियों का अंतर।

महाराष्ट्र में इन दिनों स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर ऐसा हंगामा मचा है मानो विधानसभा चुनाव हो रहे हों। खासकर मुंबई में 15 जनवरी को हुए चुनावों ने तो सबको चौंका दिया। बीजेपी ने यहां जबरदस्त कमबैक किया और ज्यादातर सीटें झटक लीं। ऊपर से एशिया का सबसे बड़ा नगर निगम, बीएमसी (Brihanmumbai Municipal Corporation) में भी पहली बार पार्टी मेयर बनाने की मजबूत स्थिति में आ गई है। ये देखकर कई लोग सोच में पड़ गए होंगे कि आखिर ये निकाय चुनाव होते क्या हैं? और इनमें नगर निगम और नगर पालिका का चक्कर क्या है? चलिए, आज हम इसे बहुत ही आसान भाषा में समझते हैं, बिल्कुल घर बैठे चाय की चुस्की लेते हुए।

स्थानीय निकाय शहर की छोटी-सी सरकार

सोचिए, आपका शहर या कस्बा एक बड़ा परिवार है। रोजमर्रा के झगड़े-झंझट निपटाने के लिए घर में एक छोटा सा कमिटी होता है ना? वही हाल यहां है। देश में हर शहर, कस्बे या गांव के लिए स्थानीय निकाय बने होते हैं, जो लोकल सरकार की तरह काम करते हैं। इनका काम है पानी की सप्लाई सुनिश्चित करना, सड़कें साफ रखना, कचरा उठवाना, पार्कों की देखभाल करना। बड़े शहरों में ये जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं, तो सिस्टम भी बड़ा हो जाता है। छोटे कस्बों में नगर पालिका हो सकती है, लेकिन जितना बड़ा शहर, उतना बड़ा निकाय। ये सब लोकतंत्र की जड़ हैं, जहां आम आदमी सीधे चुनता है अपने प्रतिनिधियों को।

नगर निगम: महानगरों का बॉस

अब बात करते हैं नगर निगम की, जो बड़े-बड़े शहरों का राजा होता है। नियम ये कहता है कि जहां आबादी 5 लाख से ज्यादा हो, वहां नगर निगम बनता है। जैसे मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, पुणे, बेंगलुरु या अहमदाबाद। इन शहरों का इलाका इतना विशाल होता है कि कामकाज भी मेगा लेवल का। नगर निगम को कई वार्डों में बांटा जाता है – हर वार्ड से लोग अपना पार्षद चुनते हैं। ये पार्षद मिलकर निगम की मीटिंग्स करते हैं, बजट पास करते हैं, विकास प्लान बनाते हैं। सबसे ऊपर महापौर होते हैं, जिन्हें मेयर कहते हैं। कुछ राज्यों में पार्षद मेयर चुनते हैं, तो कहीं डायरेक्ट जनता वोट डालती है। मेयर का रुतबा बड़ा होता है, लेकिन असल खेल तो पार्षदों के हाथ में।

मेयर और आयुक्त दो पहिए वाला रथ

नगर निगम का रथ दो पहियों पर चलता है – एक मेयर और पार्षद, दूसरा आयुक्त। मेयर चुना हुआ चेहरा होता है, जो नीतियां बनाता है। लेकिन रोजाना का खानापीना संभालता है नगर आयुक्त, जो राज्य सरकार की ओर से नियुक्त होता है। आयुक्त IAS अफसर होते हैं, जो योजनाओं को ग्राउंड पर उतारते हैं। मिसाल के तौर पर, BMC में आयुक्त इकबाल सिंह चहल जैसे अफसर सिस्टम को दौड़ा रहे हैं। पार्षदों का रोल फैसला लेना है – नई सड़कें बनवाना, स्कूल-अस्पताल सुधारना। लेकिन बिना आयुक्त के ये सिर्फ कागज पर रह जाते। दोनों मिलकर शहर को चमकाते हैं।

नगर पालिका vs नगर निगम

अब सबसे बड़ा सवाल – नगर पालिका और नगर निगम में फर्क क्या? आसान है भाई! नगर पालिका छोटे शहरों या कस्बों के लिए, जहां आबादी 20,000 से 5 लाख तक हो। ये छोटा सिस्टम है, कम वार्ड, कम बजट। मेयर की बजाय अध्यक्ष होता है। लेकिन नगर निगम तो महानगर का बादशाह – बड़ा इलाका, ज्यादा टैक्स, भारी जिम्मेदारियां। मिसाल लीजिए, लखनऊ या कानपुर में नगर निगम है, लेकिन नजदीकी छोटे शहर जैसे हल्द्वानी में नगर पालिका। पैसे की बात करें तो दोनों प्रॉपर्टी टैक्स, वॉटर बिल, पार्किंग चार्ज, विज्ञापन शुल्क से कमाते हैं। लेकिन निगम के पास सेंट्रल फंड भी ज्यादा आता है।

क्यों महत्वपूर्ण हैं ये चुनाव?

महाराष्ट्र जैसे राज्य में BMC चुनाव इसलिए हिट रहे क्योंकि ये लोकल मुद्दों पर फोकस करते हैं। सड़कें टूटी हैं? कचरा सड़ रहा? पानी की किल्लत? सबका जवाब निकाय चुनाव देते हैं। BJP की इस जीत से पता चलता है कि वोटर अब राष्ट्रीय मुद्दों से हटकर लोकल डेवलपमेंट देख रहे। BMC जैसा दिग्गज अगर BJP के हाथ लगे, तो मुंबई का फेस चेंज हो सकता है। कुल मिलाकर, ये चुनाव साबित करते हैं कि लोकतंत्र नीचे से ऊपर उठता है।

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