
दिल्ली हाईकोर्ट ने विधवाओं के अधिकारों को लेकर एक बड़ा फैसला सुनाया है, अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई निःसंतान विधवा दोबारा शादी करती है, तब भी उसे मिलने वाली पारिवारिक पेंशन बंद नहीं की जाएगी, कोर्ट ने इसे सरकार की एक ऐसी कल्याणकारी नीति बताया है जिसका उद्देश्य विधवाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना और उन्हें पुनर्विवाह के लिए प्रोत्साहित करना है।
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क्या है ‘नियम 54’ और कोर्ट का फैसला?
अदालत ने CCS (पेंशन) नियम, 1972 के नियम 54 और सितंबर 2009 के एक आधिकारिक ज्ञापन (Office Memorandum) की वैधता को सही ठहराया। कोर्ट के अनुसार:
- पारिवारिक पेंशन कोई ‘विरासत’ या ‘संपत्ति’ नहीं है, बल्कि एक वैधानिक अधिकार (Statutory Right) है जो नियमों के अनुसार तय होता है।
- पेंशन जारी रहने के लिए केवल एक शर्त है—विधवा की अन्य स्रोतों से होने वाली स्वतंत्र आय सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम सीमा (वर्तमान में ₹9,000 + DA) से कम होनी चाहिए।
- पेंशन नियमों के तहत पहला हक पति/पत्नी का होता है, माता-पिता को पेंशन केवल तभी मिल सकती है जब मृतक का कोई जीवनसाथी या बच्चा न हो।
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माता-पिता की याचिका हुई खारिज
यह मामला एक सीआरपीएफ (CRPF) जवान के माता-पिता द्वारा दायर किया गया था, उन्होंने मांग की थी कि उनकी बहू के पुनर्विवाह के बाद पेंशन उन्हें मिलनी चाहिए, हालांकि, अदालत ने उनकी दलील को खारिज करते हुए कहा कि बहू (निःसंतान विधवा) ही पेंशन की प्राथमिक हकदार है, भले ही उसने दूसरी शादी कर ली हो।
न्यायालय की टिप्पणी
पीठ ने कहा कि सशस्त्र और अर्धसैनिक बलों के जवानों द्वारा समाज के लिए दिए गए बलिदान के बाद उनके आश्रितों को वित्तीय रुप से असुरक्षित नहीं छोड़ा जा सकता।
















